
कॉरिजेंडम बना निविदा में बड़े खेल का माध्यम
देहरादून।
उत्तराखंड में यदि आपकी सेटिंग अधिकारियों से ठीक है तो फिर कुछ भी संभव है। आप अपने हिसाब से नियम बना सकते हैं। यही नहीं अगर निविदा निकल भी गई और आप उसमें फिट नहीं बैठ रहे हैं तो भी घबराने की बात नहीं है। आप आइए और विभाग में सेटिंग कर कॉरिजेंडम के माध्यम से एंट्री कर सकते हैं।
हाल में इसी प्रकार का मामला जलागम में देखने को मिला है।
वर्ल्ड बैंक द्वारा वित्त पोषित उत्तराखंड क्लाइमेट रेस्पॉन्सिव रैनफ़ेड फार्मिंग प्रोजेक्ट हेतु जियो मेम्ब्रेन टैंक की स्थापना के लिए कंपनियों की एम्पेनेलमेंट प्रक्रिया में दिखी जलागम के अफ़सरों की मनमानी, एक निजी कंपनी को लाभ पहुँचाने के लग रहे आरोप?
जलागम विभाग द्वारा वर्ल्ड बैंक द्वारा वित्त पोषित उत्तराखंड क्लाइमेट रेस्पॉन्सिव रैनफ़ेड फार्मिंग प्रोजेक्ट हेतु 12800 लीटर एवं 20000 लीटर जियो मेम्ब्रेन टैंक की स्थापना के लिए कंपनियों की एम्पेनेलमेंट प्रक्रिया 11 अगस्त, 2026 को शुरू की गई और इस प्रक्रिया की प्री बिड मीटिंग 25 अगस्त को बुलाई गई।
भारत सरकार के सामान्य वित्तीय नियम (General Financial Rules – GFR 2017) के नियम 173(x) के अनुसार, प्री-बिड मीटिंग (Pre-bid Conference/Meeting) का प्राथमिक उद्देश्य निविदा (Tender) दस्तावेजों में दी गई तकनीकी विशिष्टताओं (Specifications), शर्तों और अन्य संविदात्मक (Contractual) विवरणों के बारे में संभावित बोलीदाताओं (Bidders) की शंकाओं को दूर करना और स्पष्टीकरण देना है।
सूत्रों के अनुसार इस प्री बिड मीटिंग में चार कंपनियों द्वारा 13 सुझाव रखे गए जिसमें से अधिकतर का स्पष्टीकरण देकर उन्हें अधिकारियों द्वारा ख़ारिज कर दिया गया। वहीं एक कंपनी जो कि निविदा में दी गई प्रमुख शर्त 12800 व 20000 लीटर जियो मेम्ब्रेन टैंक बनने का अनुभव अनिवार्य था। उक्त कम्पनी की ओर से इस अनिवार्य शर्त को घटाकर 10000 लीटर टैंक के एक्सपीरिएंस को सम्मिलित करने का सुझाव दिया गया जिसे तत्काल मानते हुए अधिकारियों ने इससे संबंधित कॉरिजेंडम भी निकाल दिया गया। इससे स्पष्ट है कि उक्त कंपनी को लाभ पहुंचाने की दृष्टि से ही मूल निविदा में यह परिवर्तन किया गया है।
जबकि अन्य कंपनियों की ओर से निविदा में दी गई शर्तों में कार्य अनुभव के आधार पर मार्किंग में शिथिलता देने के सुझावों को यह कह कर खारिज कर दिया गया कि दूसरे विभागों द्वारा निकाले गए टेंडर में भी इसी प्रकार की शर्त रहती है। लेकिन जब 10000 लीटर के टैंक बनाने के एक्सपीरियंस को सम्मिलित करने की बात आई तो दूसरे विभागों द्वारा निकाले गए टेंडर पर ध्यान नहीं दिया गया।
हाल ही में कृषि विभाग द्वारा निकाले गए टेंडर में भी 20000 लीटर टैंक बनने के लिए 20000 लीटर टैंक बनाने के एक्सपीरियंस की शर्त रखी गई थी। तो फिर यहां विभागीय अधिकारियों की ओर से 12800 व 20000 लीटर टैंक बनाने के लिए 10000 लीटर बनाने वाली कंपनी को शामिल करने के लिए किस आधार पर निविदा में परिवर्तन कर दिया। अधिकारियों की से अपनाए गए यह दोहरे मानक साफ़ किसी एक कंपनी को फ़ायदा पहुँचाने की ओर इशारा करते हैं।
जब प्रोजेक्ट हेतु 12800 लीटर एवं 20000 लीटर के टैंकों की आवश्यकता है तो 10000 लीटर के टैंकों के एक्सपीरियंस को क्यों मान्य किया जा रहा है? सवाल यह है कि यदि इस शर्त की कोई अहमियत नहीं है तो फिर 10000 लीटर ही क्यों, किसी भी कैपेसिटी (जैसे 5000, 2000,1000 लीटर )के टैंक बनाने के एक्सपीरियंस को मान्य क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
अब बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इस मामले में निदेशालय स्तर के अधिकारी शामिल या अधिकारियों को शासन व मंत्रालय का भी आशीर्वाद प्राप्त है।
इस संबंध में विभागीय सचिव दलीप जावलकर से कई बार फोन पर संपर्क किया गया लेकिन उनकी ओर से कोई रिस्पांस नहीं मिला। इस संबंध में जब उनका जबाव मिलेगा उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।
और अगर नहीं तो क्या वर्ल्ड बैंक के इस प्रोजेक्ट में हो रही गड़बड़ी को रोकने के लिए मंत्रालय कोई सख्त कदम उठाएगा?।या फिर मुख्यमंत्री धामी की जीरो टॉलरेंस को धत्ता बतते हुए भ्रष्टाचार चलता रहेगा।




