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उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र को संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल कराना- बाबी पंवार

गढ़वाल और कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्रों के ऐतिहासिक दस्तावेज

देहरादून।

उत्तराखण्ड स्वाभिमान मोर्चा के अध्यक्ष बाबी पंवार ने कहा कि
ब्रिटिश काल में देश के अनेक क्षेत्रों को उनकी विशिष्ट ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को देखते हुए उनके संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए अधिसूचित किया गया था। उसी कालखण्ड में भारत के कुछ जन-जातीय और पर्वतीय क्षेत्रों को उनकी सांस्कृतिक, सामाजिक तथा भौगोलिक जटिलता के कारण सन् 1815-1874 ई० में गैर-विनियमित क्षेत्र (Non-regulated Area) घोषित कर, सामान्य ब्रिटिश भारतीय प्रशासनिक और न्यायिक ढांचे से अलग रखा गया। 1935 ई० के बाद में इन्हें ‘बहिष्कृत क्षेत्र’ (Excluded Area) और ‘अर्ध-बहिष्कृत क्षेत्र’ (Partially Excluded Area) में रखा गया। इन क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासन ने विशेष प्रावधान लागू किए थे, जो सामान्य या विनियमित (Regulated) प्रांतों से भिन्न थे। इसके अंतर्गत तत्कालीन संयुक्त प्रांत (बाद में उत्तर प्रदेश) के गढ़वाल और कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्रों को जन-जातीय क्षेत्र मानते हुए, यहाँ Scheduled District Act, 1874 के प्रावधान आज़ादी से पूर्व तक लागू थे।

प्रशासनिक व्यवस्था
इन गैर-विनियमित क्षेत्रों में सामान्य ब्रिटिश कानून और नियम पूरी तरह लागू नहीं किए जाते थे। इसके बजाय, स्थानीय शासकों, जन-जातीय नेताओं या विशेष आयुक्तों को प्रशासनिक अधिकार दिए गए थे। इन क्षेत्रों में गवर्नर जनरल या उनके अधीनस्थ अधिकारियों को व्यापक शक्तियाँ दी गई थीं, ताकि वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रशासन चला सकें।
सन् 1874 तक गढ़वाल और कुमाऊँ में Scheduled District Act, 1874 के तहत जन-जातीय कानून लागू थे। नीचे दिए गए कानून इसी अधिनियम की नियमावली के अंतर्गत आते थे, जैसे-
कुमाऊँ वन पंचायत अधिनियम, 1931: इस अधिनियम के माद्यम से पर्वत-वासियों को स्थानीय वनों से रोजगार का अधिकार दिया था, परंतु 1974 में इस कानून को उत्तर प्रदेश वन अधिनियम के अंतर्गत लाकर अधिकांश अधिकार उनसे छीन लिए गए।

कुमाऊ पुलिस आधनियम, 1916: इस आधनियम के माद्यम से गढ़वाल-कुमाऊ क्षेत्र क जन-जातीय पर्वतीय इलाकों में सामान्य पुलिस व्यवस्था लागू नहीं थी। स्वतंत्रता-पूर्व काल से 1974 तक कानून-व्यवस्था, अपराधों की प्रारंभिक जाँच, रिपोर्टिंग तथा राजस्व से सम्बन्धित पुलिसीय अधिकार पटवारियों के पास निहित थे। ऐसी विशेष प्रशासनिक व्यवस्था केवल जन-जातीय क्षेत्रों में ही देखने को मिलती है।
यही व्यवस्था आज के संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूची का आधार मानी जाती है।
महत्वपूर्ण है कि, 1952 से 2000 ई० तक पहाड़ी समुदाय को उच्च शिक्षा में 6% आरक्षण प्राप्त था, जिसे वर्ष 2000 में समाप्त कर दिया गया।
गढ़वाल एवं कुमाऊँ क्षेत्र जन-जातीय दर्जे के पात्र

1. विशेष भौगोलिक स्थितिः पर्वतीय क्षेत्र का लगभग 80% हिस्सा वन क्षेत्र है, जो यहाँ के समुदाय को Tribe दर्जा प्राप्त करने का स्वाभाविक आधार प्रदान करता है।

2. पिछड़ापनः अधिकांश पहाड़ी परिवारों के पास आधा एकड़ से भी कम भूमि बची है, जिससे वे भूमिहीन या सीमांत किसान की श्रेणी में आते हैं। स्कूल, कॉलेज और अस्पताल जैसी मूलभूत सुविधाएँ आज भी नदारद हैं। बेरोजगारी के कारण लगभग 70% लोग पलायन कर चुके हैं।

3. विशिष्ट संस्कृति और आदिम लक्षणः उत्तराखण्ड का जनमानस प्रकृति-पूजक है। बिस्सू, नुणाई, मरोज, दुबड़िया, बूढ़ी दीवाली, आठौ, फूलदेई, खतडुवा, इगास-बग्वाल, हलिया दशहरा, रम्माण, हिलजात्रा जैसे त्योहार; कठपतिया, ऐपण कला, बलि प्रथा, तंत्र-मंत्र, घड़ियाल / बारनी लगाना, मशाण जगाना, जागर-मंडाण लगाना, देव माली व्यवस्था जैसी परंपराएँ; और वनों पर आधारित आजीविका यहाँ की जन-जातीय जीवनशैली को दर्शाती हैं। बिना मशीनों, सिंचाई सुविधाओं या रासायनिक खाद के कृषि आज भी पूरी तरह आदिम पद्धति पर आधारित है। खेती मौसम पर निर्भर है और बैलों या मनुष्यों द्वारा हल खींचकर की जाती है। भूमि सामुदायिक गोल खाता प्रणाली के तहत चली आती है। ये सभी लक्षण उत्तराखण्ड को जन-जातीय दर्जे का स्वाभाविक हकदार बनाते हैं।

4. आम समुदाय से संपर्क में संकोचः गढ़वाल एवं कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्रों के निवासी


ऐतिहासिक रूप से भौगोलिक दुर्गमता, सीमित शैक्षणिक अवसरों तथा विशिष्ट सांस्कृतिक परिवेश के कारण देश की मुख्यधारा से अपेक्षाकृत अलग-थलग रहे हैं। इस दीर्घकालीन अलगाव का प्रभाव उनके सामाजिक व्यवहार एवं मनोवैज्ञानिक विकास पर भी पड़ा है, जिसके परिणामस्वरूप समुदाय के एक वर्ग में बाहरी परिवेश के प्रति झिझक एवं आत्मविश्वास की कमी देखी जाती है। इसके प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं-
ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े बच्चों को शहरी वातावरण में सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई का अनुभव होता है।
पर्वतीय क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में प्रवास करने वाले व्यक्ति प्रारंभिक अवस्था में स्वयं को असहज महसूस करते हैं।
प्रवास के उपरांत ऐसे व्यक्तियों द्वारा विभिन्न स्थानों पर क्षेत्रीय या प्रवासी संगठनों का गठन किया जाता है, जिससे वे सांस्कृतिक निकटता एवं सामाजिक सहजता बनाए रख सकें।
इस प्रकार, यह संकोच मुख्यतः ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का परिणाम है, जिसे उपयुक्त शैक्षणिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समावेशन के माध्यम से दूर किया जा सकता है।
10 दिसंबर 2025 को भारत सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया है कि अब राज्य सरकार को एक विधेयक पारित कर जनजातीय दर्जे की माँग का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजना अनिवार्य है।
ध्यान देने योग्य है कि भारत के सभी 11 पर्वतीय राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों के मूल निवासी समुदायों को Tribe Status प्राप्त है, फिर केवल गढ़वाल एवं कुमाऊँ क्षेत्र के साथ ही भेदभाव क्यों?
हाल ही में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी समुदाय और गद्दी ब्राह्मणों को Tribe Status दिया है।
वहीं उत्तराखण्ड में नेपाली समुदाय, वन गुर्जर (मुस्लिम समुदाय) तथा 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से आए लोगों को भी आरक्षण देने की तैयारी चल रही है।
यदि इन समुदायों को Tribe Status दिया जा सकता है, तो फिर उत्तराखण्ड के मूल निवासियों को इससे वंचित क्यों रखा गया?
खस जन-जाति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह सर्वविदित है कि ऐतिहासिक दृष्टि से यह क्षेत्र खसों की कर्मभूमि रहा है।
डॉ० लक्ष्मी दत्त जोशी ने 1929 में लंदन विश्वविद्यालय से अपने पी०एच०डी० शोधग्रंथ “Khas Family Law (Government Press, United Provinces) में खसों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रमाणिक तथ्य प्रस्तुत किए। यह ग्रंथ कई वर्षों तक न्यायालयों में संदर्भ ग्रंथ के रूप में प्रयुक्त हुआ। उन्होंने उत्तराखण्ड के लगभग 80% निवासियों को खस बताया है।
इतिहासकार बद्रीदत्त पांडे (कुमाऊँ का इतिहास) और डॉ० लक्ष्मी दत्त जोशी के अनुसार, खस वैदिक काल से पूर्व आर्य जाति की एक सशक्त शाखा थे, जो कश्मीर-नेपाल के हिमालयी क्षेत्र से उत्तराखण्ड पहुंचे।
पंडित पन्नालाल (Kumaon Customary Law, पृ. 10, सूची ‘A’) तथा डॉ. पातीराम (Garhwal -Ancient and Modern) के अनुसार भी गढ़वाल और कुमाऊँ के प्रमुख निवासी खस ही थे।
“हिन्दू कानून के धार्मिक सिद्धांतों से इनकी स्वतंत्रता मुख्यतः इस तथ्य से है कि खस लोग गंगा के मैदानों में बसने वाले भारतीय आर्यों के शक्तिशाली सांस्कृतिक विकास से अलग थे। डॉ० लक्ष्मी दत्त जोशी, Khas Family Law (1929), पृष्ठ 311-312
खस समुदाय में ब्राह्मण, क्षत्रिय, दलित और अन्य उपसमुदाय सभी शामिल हैं। ऐतिहासिक रूप से यह शस्त्रजीवीदृशासक समुदाय रहा है, और आज भी उन्हें “खस” या “खसिया” नाम से जाना जाता है। इनके त्यौहार, रीति-रिवाज, मान्यताएँ, बोली-भाषा तथा जीवन पद्धति अब भी पारंपरिक स्वरूप में मौजूद हैं।
प्रकृति और वनों से गहरा नाता
खस जनजाति का जीवन वनों और प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। वे खेती, पशुपालन और दैनिक आवश्यकताओं के लिए वनों पर निर्भर रहते हैं। इनका जीवन पर्यावरण संरक्षण का आदर्श उदाहरण है। जंगलों में आग लगने पर पूरा समुदाय उसे बुझाने के लिए तत्पर हो जाता है। जल स्रोतों को गंदा करना या जंगलों में आग लगाना पाप माना जाता है।
देवी-देवता और आस्था दुनिया के अन्य आदिवासी समुदायों की तरह, उत्तराखंड के खस लोगों की भी आस्था प्रकृति, पूर्वजों और लोकदृदेवताओं से जुड़ी है। ये लोगग्वेल, नारसिंह, हरज्यू सैमज्यू गंगनाथ, नागनाथ, भोलनाथ, धौलीनाग, भूमियाँ, कोटगढ़ी माई, गड़देवी, नंदादेवी, बधाण, एड़ी, लाटू, छुरमल, महासू, हरू, और चौमू आदि देवताओं की पूजा करते हैं। देवी या देवता से आहूत व्यक्ति को ‘पश्वा” या “देव माली” कहा जाता है।
कुमाऊँ मण्डल में गोलू देवता को न्याय का देवता माना जाता है। प्रशासन और न्यायालय से निराश व्यक्ति चितई (अल्मोड़ा) स्थित मंदिर या पाँखू (बागेश्वर) की कोटगाड़ी माई में मुकदमे के कागजात टाँग कर न्याय की याचना करता है।
निर्दोष व्यक्ति पर अत्याचार करने वाले व्यक्ति के खिलाफ जौनसार बावर के महासू महाराज एवं उत्तरकाशी जनपद के मोरी नैटवाड़ में पोखू देवता के मंदिर में घात डालकर (चावल डालकर) न्याय मांगने की परम्परा है।
परंपरागत उत्तराधिकार और रीति-रिवाज
खस समुदाय के अपने पारंपरिक टोटम हैं- कठपतिया, गोदना, ऐपण, और खतडुआ, जो अब त्योहार का रूप ले चुका है।
इनके उत्तराधिकार नियम अन्य हिंदू कानूनों से भिन्न रहे हैं। सौतिया बॉट प्रथा के अनुसार पति की संपत्ति पुत्रों के अलावा पत्नियों (सौतनों) में भी बाँटी जाती थी। जेठोंन प्रथा के अंतर्गत सबसे बड़े भाई को अतिरिक्त उपजाऊ भूमि या अन्य संपत्ति दी जाती थी।
मेले और त्यौहार
विश्व के अन्य जन-जातीय समुदायों की तरह, उत्तराखण्ड का खस समुदाय भी प्रकृति का उपासक है। इनके अधिकांश त्योहार कृषि और ऋतु परिवर्तन से जुड़े हैं, जैसे फूलदेई, हरेला, घी संकरांत, खतडुआ, हलिया दशहरा, इगास, बग्वाल, रम्माण और हिलजात्रा। ये पर्व मुख्यधारा के पौराणिक उत्सवों से भिन्न हैं और उनकी जनजातीय परंपरा को प्रमाणित करते🙏 हैं।
पाँचवी अनुसूची (Fifth Schedule)
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के अंतर्गत पाँचवीं अनुसूची विशेष रूप से अनुसूचित क्षेत्रों और वहाँ के जन-जातीय निवासियों के हितों की रक्षा के लिए बनाई गई है। इसका उद्देश्य इन क्षेत्रों के प्रशासन, विकास, और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में जन-जातीय भागीदारी सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही यह उनकी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और संवर्द्धन की व्यवस्था करती है।
पाँचवीं अनुसूची लागू होने के संभावित लाभ

1. भू-कानूनः


Tribe Status या पाँचवी अनुसूची लागू होते ही देश का सबसे सख्त भू-कानून और मूलनिवास, 1950 की व्यवस्था स्वतः लागू हो जाएगी।

2. रोजगारः


केंद्र और राज्य सरकारों में शिक्षा व नौकरियों में आरक्षण मिलेगा (केंद्र 7.5% एवं राज्य 50%)।
PESA अधिनियम 1996 के अंतर्गत लगभग तीन लाख परिवारों को जल, जंगल और खनिज-संबंधी कार्यों से रोजगार प्राप्त होगा, तथा माइनर मिनरल के ठेके केवल स्थानीय लोगों को दिए जाएंगे।

3. भूमिहीन किसानों को भूमिः


FRA 2006 (Forest Rights Act) के अंतर्गत कृषि भूमि का आवंटन किया जा सकेगा, जैसा कि हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति और किन्नौर में लागू है।

4. महिला सुरक्षाः


जन-जातीय महिलाओं का ST Act के तहत विशेष कानूनी सुरक्षा प्राप्त होगी।

5. शराबबंदीः


PESA अधिनियम, 1996 की धारा 4 (m) (ii) के अंतर्गत ग्रामसभा को मादक पदार्थों की बिक्री एवं खपत को नियंत्रित या पूर्णतः प्रतिबंधित करने का अधिकार प्राप्त होगा।

6. मजबूत ग्राम समाः


ग्राम सभाओं को केंद्र और राज्य दोनों से विशेष निधि प्राप्त होगी। उन्हें अपने क्षेत्र में सामाजिक निर्णय लागू करने की संवैधानिक शक्ति मिलेगी।

7. भाषा एवं संस्कृति का संरक्षणः


गढ़‌वाल तथा कुमाऊँ के क्षेत्रों में बोली जाने वाली स्थानीय बोलियों को प्रोत्साहन एवं संरक्षण प्राप्त होगा जिससे की ये बोलियां जीवित रहेगी।

8. वन्यजीव प्रबंधनः


वन्यजीवों के हमलों की स्थिति में वन विभाग को ग्रामसभा के निर्णय लागू करना अनिवार्य होगा। रैपिड रिस्पॉन्स टीम (RRT) के माध्यम से त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

9. परिसीमनः


उत्तराखण्ड में क्षेत्रफल-आधारित परिसीमन तभी व्यावहारिक हो सकेगा जब पर्वतीय समुदायों को संवैधानिक संरक्षण (Tribe Status) प्राप्त होगा। जिस प्रकार “परिसीमन अधिनियम, 2002” की धारा 10A के अंतर्गत पूर्वोत्तर राज्यों (अरुणाचल, असम, मणिपुर, नागालैंड) को विशेष प्रावधान प्रदान किए गए हैं, वैसा ही प्रावधान उत्तराखण्ड के लिए भी आवश्यक है।

10. रिवर्स पलायनः


पांचवी अनुसूची लागू होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होने से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक स्थिरता सुदृढ़ होगी जिससे रिवर्स पलायन होगा।

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