उत्तराखंडराजनीति

नियम 310 और सदन की गरिमा: हरबंस कपूर की वह व्यवस्था जिसने विधानसभा की कार्यशैली बदल दी

भराड़ीसैंण (गैरसैंण) में चल रहे उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र के पाँचवें दिन आज सुबह ठीक 11 बजे जैसे ही सदन की कार्यवाही शुरू हुई, माहौल में हल्की सी राजनीतिक मुस्कान भी घुल गई। विपक्ष के नेता यशपाल आर्य ने खड़े होकर विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी भूषण से नियम 310 के अंतर्गत अपनी बात रखने की अनुमति मांगी। इस पर अध्यक्ष ने मुस्कराते हुए कहा— “लगता है 310 को तो हमने अब नियम ही बना लिया है।”

स्पीकर की इस हल्की टिप्पणी ने सदन के वातावरण को कुछ पल के लिए सहज बना दिया, लेकिन इसके भीतर एक गहरी संसदीय सच्चाई भी छिपी थी। उत्तराखंड विधानसभा में नियम 310 के तहत मुद्दे उठाने की परंपरा वर्षों से राजनीति और संसदीय रणनीति का हिस्सा रही है। कई बार यह जनहित के सवालों को तत्काल उठाने का माध्यम बनता है, तो कई बार सदन की कार्यवाही को प्रभावित करने वाला औजार भी।

यह दृश्य केवल एक संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था, बल्कि उत्तराखंड विधानसभा के इतिहास की उस महत्वपूर्ण व्यवस्था की याद भी दिलाता है, जिसे कभी दिवंगत विधानसभा अध्यक्ष हरबंस कपूर ने स्थापित किया था। एक ऐसी व्यवस्था, जिसने सदन के कामकाज को हंगामे से निकालकर संवाद और जवाबदेही की दिशा में मोड़ा।

उत्तराखंड एक नया राज्य था। वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद शुरुआती वर्षों में विधानसभा की कार्यवाही भी एक तरह से अपनी परंपराएँ तलाश रही थी। लेकिन उस दौर में एक समस्या लगातार सामने आती थी। जैसे ही सदन की कार्यवाही शुरू होती, विपक्ष नियम 310 के तहत तात्कालिक मुद्दे उठाने की मांग करता, नारेबाजी होती और कई बार सदन स्थगित हो जाता। परिणाम यह होता कि सबसे महत्वपूर्ण संसदीय प्रक्रिया — प्रश्नकाल — ठीक से चल ही नहीं पाता।

प्रश्नकाल लोकतंत्र का वह क्षण होता है जब विधायक सीधे सरकार से सवाल पूछते हैं और सरकार को जवाब देना पड़ता है। लेकिन जब प्रश्नकाल ही बाधित हो जाए, तो जनता के मुद्दे भी अधर में रह जाते हैं। यहीं से शुरू होती है हरबंस कपूर की वह संसदीय दृष्टि, जिसने उत्तराखंड विधानसभा की कार्यशैली को नई दिशा दी।

नियम 310 क्या है

विधानसभा की कार्यवाही में नियम 310 एक ऐसा प्रावधान है, जिसके तहत कोई भी विधायक किसी अत्यंत महत्वपूर्ण और तात्कालिक विषय पर सदन का ध्यान आकर्षित कर सकता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक जरूरी हिस्सा है, क्योंकि इसके माध्यम से जनहित के मुद्दे तुरंत सदन में उठाए जा सकते हैं। लेकिन हर संसदीय व्यवस्था की तरह इसका भी संतुलन जरूरी होता है। यदि हर दिन की शुरुआत इसी से हो और हंगामे में बदल जाए, तो सदन का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।

हरबंस कपूर का ऐतिहासिक निर्णय

साल 2007 में जब हरबंस कपूर उत्तराखंड विधानसभा के अध्यक्ष बने, तब उन्होंने इस स्थिति को गंभीरता से समझा। उन्होंने एक नई व्यवस्था लागू की—सदन में सुबह 11 बजे से 12:30 बजे तक प्रश्नकाल अनिवार्य रूप से चलेगा और नियम 310 के अंतर्गत विषय प्रश्नकाल के बाद उठाए जाएंगे। यह निर्णय साधारण प्रशासनिक आदेश नहीं था, बल्कि संसदीय परंपरा को व्यवस्थित करने का एक दूरदर्शी कदम था। इससे पहली बार उत्तराखंड विधानसभा में प्रश्नकाल नियमित रूप से चलने लगा और विधायकों को राज्य के मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगने का पूरा अवसर मिलने लगा। संसदीय राजनीति में यह भी एक स्थापित तथ्य है कि अक्सर सत्ता पक्ष से आने वाला स्पीकर ऐसे फैसलों से बचता है, क्योंकि इससे विपक्ष को सरकार से तीखे सवाल पूछने का मंच मिलता है। लेकिन हरबंस कपूर ने इस जोखिम की परवाह नहीं की। उन्होंने सदन की गरिमा और लोकतांत्रिक जवाबदेही को प्राथमिकता दी।

गरिमा और सादगी का अद्भुत संतुलन

प्रोटोकॉल के अनुसार राज्य में विधानसभा अध्यक्ष का पद राज्यपाल के बाद दूसरा सबसे बड़ा संवैधानिक पद माना जाता है। हरबंस कपूर ने इस पद की गरिमा को केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे अपने व्यवहार में भी उतारा।

वे 1990 से 2021 तक देहरादून से आठ बार विधायक रहे। इतने लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद उनके व्यक्तित्व में एक असाधारण सादगी दिखाई देती थी। देहरादून के लोग उन्हें अक्सर अपनी वेगनआर कार में सामान्य ढंग से घूमते हुए देखते थे।

उनका जनता से जुड़ाव भी उतना ही सहज था। सुबह-सुबह अपने क्षेत्र में स्कूटर से निकल जाना, लोगों के घरों में बैठकर चाय पीना, समस्याएँ सुनना और स्थानीय विकास के कामों को आगे बढ़ाना — यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। देहरादून में उनके कार्यकाल के दौरान बनी कई सड़कों और स्थानीय विकास कार्यों में उस जनप्रतिनिधि की छाप दिखाई देती है जो जनता के बीच रहकर राजनीति करता था।

एक संसदीय विरासत

हरबंस कपूर के विधानसभा अध्यक्ष रहते हुए तीन मुख्यमंत्री बदले, लेकिन उनकी निष्पक्षता पर कभी कोई गंभीर प्रश्नचिह्न नहीं लगा। यही कारण है कि उन्हें उत्तराखंड विधानसभा के सबसे गरिमामय और प्रभावशाली अध्यक्षों में गिना जाता है।

राजनीतिक जीवन में एक कसक यह भी रही कि 2017 के बाद उन्हें मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिल पाया। हालांकि उनकी पहचान मंत्री पद से नहीं, बल्कि एक ऐसे विधायक और स्पीकर के रूप में बनी जिसने संसदीय परंपराओं को मजबूत किया।

आज जब भराड़ीसैंण में चल रहे विधानसभा सत्र में नियम 310 के तहत मुद्दे उठते हैं और सदन में उस पर चर्चा होती है, तो अनायास ही हरबंस कपूर की वह व्यवस्था याद आती है जिसने उत्तराखंड विधानसभा को एक अनुशासित और सार्थक बहस की दिशा दी थी।

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। वह सदनों की मर्यादा, प्रश्नों की ताकत और जवाबदेही की संस्कृति से जीवित रहता है। हरबंस कपूर का नियम 310 से जुड़ा निर्णय इसी लोकतांत्रिक संस्कृति की एक स्थायी मिसाल है।

प्रस्तुतकर्ता वरिष्ठ पत्रकार शीशपाल गुंसाई –

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button